*‘वंदे मातरम’ नहीं, भारत की आत्मा का महामंत्र है—जिसकी गूंज ने हिला दी थी अंग्रेजी हुकूमत की नींव : डॉ. आशुतोष त्रिपाठी*
*एकता की अभेद्य ढाल बना वंदे मातरम, भाषा-धर्म और जाति की सीमाएं तोड़कर देश को एक सूत्र में पिरोया*
*हिंदी दिवस पर विशेष : मातृभूमि के प्रति श्रद्धा, त्याग और राष्ट्रचेतना का अमर उद्घोष है ‘वंदे मातरम’*
*जौनपुर।* हिंदी दिवस के विशेष अवसर पर डॉ. आशुतोष त्रिपाठी ने ‘वंदे मातरम’ की महत्ता को रेखांकित करते हुए इसे भारत की राष्ट्रीय चेतना, अस्मिता और एकता का सुदृढ़ एवं अभेद्य महामंत्र बताया। उन्होंने कहा कि वंदे मातरम महज छह अक्षरों अथवा दो शब्दों का साधारण ध्वनि समूह नहीं, बल्कि भारतवर्ष की आत्मा को जागृत करने वाला ऐसा दिव्य उद्घोष है, जिसने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान करोड़ों भारतीयों में राष्ट्रभक्ति की भावना को प्रखर किया।
डॉ. त्रिपाठी ने कहा कि जब बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने अपने अमर उपन्यास ‘आनंदमठ’ में वंदे मातरम की रचना की थी, तब शायद किसी ने कल्पना नहीं की होगी कि आने वाले समय में यही शब्द भारत माता के करोड़ों पुत्रों और पुत्रियों के कंठ का स्वर बन जाएगा। स्वतंत्रता संग्राम में इस उद्घोष ने ब्रिटिश साम्राज्य के विरुद्ध जनचेतना को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
उन्होंने कहा कि पूर्ण श्रद्धा और भक्ति भाव से वंदे मातरम का उच्चारण करते समय हम केवल अपनी मिट्टी को नमन नहीं करते, बल्कि अपनी संस्कृति, गौरवशाली इतिहास, परंपराओं और भारत माता के प्रति समर्पण की भावना को भी अभिव्यक्त करते हैं। यह उद्घोष देशवासियों को धर्म, सत्य और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए त्याग एवं बलिदान की प्रेरणा देता है।
डॉ. त्रिपाठी के अनुसार, राष्ट्रीय आंदोलन की मूल भावना भी मातृभूमि के प्रति इसी निस्वार्थ प्रेम और श्रद्धा से जुड़ी रही। जब मन में राष्ट्र के प्रति गहरा समर्पण हो, तभी व्यक्ति राष्ट्रीय हित के लिए अपने निजी स्वार्थों का त्याग करने का संकल्प ले सकता है।
उन्होंने कहा कि वंदे मातरम ने उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक भाषा, धर्म और जाति की कृत्रिम सीमाओं को कमजोर करते हुए देशवासियों को एकता के सूत्र में पिरोने का कार्य किया। सदियों से विभिन्नताओं में बंटी जनता को इस उद्घोष ने साझा राष्ट्रीय भावना से जोड़ने का काम किया।
उन्होंने कहा कि वंदे मातरम केवल एक श्लोक या उद्घोष नहीं, बल्कि भारत की राष्ट्रीय चेतना का ऐसा महामंत्र है, जिसने स्वतंत्रता संग्राम में जनमानस को नई ऊर्जा दी और देशवासियों में मातृभूमि के प्रति प्रेम, त्याग और एकता की भावना को मजबूत किया। आज भी यह राष्ट्र की एकता, अखंडता और गौरव का सशक्त प्रतीक है।
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